
ऊंचे पर्वत शंकर बसे मै शंकर दे संग,
नी मैं मारगई नी माए एहदी नित घोटदी भंग....
ऊंचे पर्वत बरफा पैंदीया ए बर्फानी बाबा,
ना कोई ऐथे महल चोपड़ी ना कुल्ली ना ढाबा,
ए ता नित धुनिया सेके बस्मा ला वे अंग,
लोकी बीजे कनका छोले एह ने भंग दे बूटे,
सारे भूत प्रेत ने लैंदे विच नशे दे झूठे,
भर भर बाटे पी बे भोला हो जाए मस्त मलंग,
मैनू सपा तो डर लगता ए माला गल विच पावे,
बड़े बड़े सिंगा नंदी ते चढ़ जावे,
लोकी देखन खड़ खड़ ए नू आखन ए भोले दे रंग,
डम डम डमरू भम भम भोला ए सारा जग गावे,
एहडी महिमा कोई न समझे न कोई समझावे,
एह तिरलोकी नाथ नी माए जटा दे विच गंग,
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