
कथा राम जी की है कल्याणकारी,
मगर ये करेगी असर धीरे धीरे,
अहंकार मद मोह फैला जो भीतर,
उतारेगी सारा जहर धीरे धीरे,
तर्ज – तुम्हे दिल्लगी।
ना मौका मिलेगा कभी झंझटो से,
जैसे भी हो कुछ समय तो निकालो,
जनम आदमी का मिले ना मिले फिर,
चली जा रही है उमर धीरे धीरे,
अगर चाहता अपना तू कल्याण प्राणी,
तो करते रहो प्रेम सभी प्राणियों से,
विनय वंदना ही अमर साधना है,
बस हिलाते रहो ये अधर धीरे धीरे,
स्वर – पूज्य राजन जी महाराज।
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