
तर्ज – हमें और जीने की चाहत
कन्हैया हमारा गुजारा ना होता,
अगर तुम ना होते,
मुसीबत में आया बनकर ये माझी,
बिन पानी के नैया चला दी,
वर्ना मैं कैसे, चैन से सोता,
माना ये आँसू अब भी निकलते,
कह रहें हों जैसे ये बहते बहते,
बताओ मैं किसके, चरणों में रोता,
मेहरबानी के सिलसिले हैं जारी,
एहसान तेरा किरपा तुम्हारी,
कहता ‘पवन’ के, हमारा क्या होता,
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