
कान्हा मेरी राखी का तुझे कर्ज चुकाना है
कान्हा मेरी राखी का,
तुझे कर्ज चुकाना है,
जन्मों जनम तक ये,
अब रिश्ता निभाना है,
तर्ज – बाबुल का ये घर।
बैठा बैठा क्या सोचे,
पकड़ ले कलैया रे,
झूठे जग के झमेले में,
खो न जाऊं मैं भैया रे,
बनके खिवैया तुझे,
परली पार ले जाना है,
रेशम की डोरी का,
मान तुझे रखना है,
मैं ना कहूं कुछ भी,
तुझको समझना है,
भूल से भी भूल मुझसे,
तुझको ना कराना है,
जिस राह पे ‘अर्चू’ चले,
वो राह अनजानी है,
थामकर उंगली मेरी,
तुझे राह दिखानी है,
बनके उजाला तुझे,
ये अँधेरा मिटाना है,
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