
कान्हा मोरे नाहीं कहुँ मोहें ठौर:
श्री कृष्ण: शरणम् मम्,
चरण शरण अब आय तिहारो,
तुम बिनु कोऊ न और,
मन अधीर तव दरस को तड़पै,
जैसो चितवत चंद चकोर,
छाड़ि दोष लीजै मोहें चरनन,
भयो हिय भाव विभोर,
राग द्वेष मिथ्या जग तजि अब,
हरि चाहूँ भक्ति तोर,
आभार; ज्योति नारायण पाठक
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