
श्याम धणी ने ये दरबार,
खुद सजवाया है,
दूर दूर से भक्तों को,
कीर्तन में बुलाया है,
हम सबसे मिलने का ख्याल,
दिल में आया है,
इसीलिए मेरे बाबा ने,
कीर्तन ये कराया है।
तर्ज – शायद मेरी शादी का।
बैठा है सांवरा,
तू मत घबराना,
चाहे जो मांग लेना,
जरा ना शर्माना,
इंतजार की घड़ी,
अब नहीं बाकी,
सज गई मेरे सांवरे की,
ये सुंदर झांकी,
बाबा ने भक्तों को,
दिल में बिठाया है,
इसीलिए भक्तों को,
खाटू से लीले चढ़ के,
बाबा आया है,
आ गए हो दर पे तो,
किर्तन भी कर लो,
नाच के झूम के,
झोलियां भी भर लो,
ये मेरा सांवरा,
बांट के राजी,
भक्तों को जितवाता है,
हारी हुई बाजी,
बाबा ने भक्तों,
हर बार जिताया है,
इसीलिए सब भक्तों को,
भक्तों की झोली भरने को,
भक्तों का बाबा से एक,
भाव का रिश्ता,
भाव है जिसके दिल में,
वो ही समझ सकता,
भक्तों के पीछ ही,
मन इनका लगता,
देख के भक्तों को इनका,
चेहरा है खिलता,
बाबा ने ही अमरीश का,
भी मान बढ़ाया है,
झूमो नाचो मिलके सभी,
ये समझाया है,
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