
कृष्ण काले हो ठुआदे मन्नै मटकी
कृष्ण काले हो,
ठुआदे मन्नै मटकी,
श्याम प्यारे हो,
और सखी जल भर भर सटगी,
राख दिये हो लाज पनघट की,
मटकी फोड़ी दही खिंडाई,
लागी लागी हो कमर में लचकी,
बीच भवर में नाव पड़ी है,
लादे लादे हो नाव मेरी अटकी,
इस कीर्तन ने पार लगादो,
बुद्धि मेरी हो भ्रम में अटकी,
गायक – नरेंद्र कौशिक जी।
प्रेषक – राकेश कुमार खरक जाटान(रोहतक)
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