
कैसी ये श्याम की माया है
हे यशोदा के लाल, हे सकल सृष्टि के पाल...
तेरी लीला का अंत कहाँ?
तू ही राह है, तू ही मंज़िल है...
कैसी ये श्याम की माया है?
कैसा ये खेल रचाया है?
जो बंधा यशोदा की रस्सी से,
उसने ब्रह्मांड घुमाया है!
जो माखन मिश्री को तरसे,
वो क्यों छप्पन भोग लगाए?
जो नन्हे हाथों से गिरि उठाए,
वो क्यों गोवर्धन कहलाए?
जो सखा बनके गैया चराए,
क्यों त्रिलोक का वो स्वामी है?
जो गोकुल की गलियों में खोया,
क्यों वो ही अंतर्यामी है?
अधर पे जिसके बांसुरी साजे,
क्यों सुदर्शन हाथ उठाए?
जो गोपियों के संग रास रचाए,
क्यों पूर्ण ब्रह्म कहलाए?
यमुना के तट पर जो राधा का,
क्यों रुक्मणी का वर होता है?
जो प्रेम की रीत सिखाता है,
क्यों विरह का सागर होता है?
कंस के कारागार में जन्मा,
क्यों महलों का राजा कहलाए?
जो ग्वाला बनकर जनम लिया,
क्यों द्वारिकाधीश बन जाए?
छोड़ के अपनी कुंज गलियाँ,
क्यों रणछोड़ वो कहलाता है?
जो हार के भी सब जीत गया,
क्यों मायावी समझा जाता है?
सारथी बन जो रथ हांक रहा,
क्यों गीता का ज्ञान सुनाता है?
जो शस्त्र न छूने की शपथ ले,
क्यों काल का रूप दिखाता है?
निहत्था खड़ा जो रणभूमि में,
क्यों जीत की डोर थामे है?
जो मोह छुड़ाने आया था,
क्यों खुद ही भक्ति में सामने है?
जो मिला सुदामा की कुटिया में,
वही कण-कण में समाया है!
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