
जगदिश के गुण को जिसने भी अपने मुख से जो गाया है
जगदिश के गुण को जिसने भी,
अपने मुख से जो गाया है,
क्या मांगु यह भी भूल गया,
पाए का पार ना पाया है।।
तर्ज – दिल लुटने वाले।
ये भी उनकी ही माया है,
दर जिसने उसे बुलाया है,
जितना जगदीश ना भाया हे,
उतना जगदीश को भाया है,
जगदिश के गुण क्या
भाग्य लिखाकर आया है,
जो कण्ठ प्रभु मन भाया है,
जन्म उसी का धन्य हुआ,
छुटी जो जग की माया है,
जगदिश के गुण पूर्ण समर्पित भाव जगे,
प्रभु चरणों में मेरा ध्यान लगे,
ह्रदय द्रवित हो नेन बहे,
अश्रु बन पुष्प चडाया है,
जगदिश के गुण फिर
देर नही कोई फेर नही,
यहॉ देर नही अन्धेर नही,
आवाज पे सारे साज बजे,
उस साज ने साज बजाया है
जगदिश के गुण ये प्रेम
नगर हे प्रेम करें,
यहॉ नेम नही बस भाव धरें,
यहॉ विधी विधान का काम नही,
वो प्रेम वशीभूत आया है,
रचनाकार – श्री सुभाषचन्द्र जी त्रिवेदी।
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