
जय तिरुपति बालाजी
जय तिरुपति बालाजी,
जय जय वेंकट स्वामी,
तुम हो अंतर्यामी,
जय श्री नाथ हरी,
अगणित नाम तुम्हारे अगणित रूप धरे,
स्वामी अगणित रूप धरे,
तुमको ध्याये उनके,
तुमने कष्ट हरे,
दाएं कर में सुदर्शन बाएं में शंख धरे,
बाएं कर में शंख धरे,
द्वार पे आये जो भी,
कामना सफल करे,
असुर बलि को हरनी वराह स्वरुप लिया,
स्वामी वराह स्वरुप लिया,
अर्धांगिनी धरती संग,
गिरी पर वास किया,
सतयुग में गरुड़ाद्रि,
त्रेता में वृषभाद्रि,
गिरी कहलाया वृषभाद्रि,
द्वापर में अंजनाद्रि,
कलि में वेंकटाद्रि,
भूमि पर ऋषियों ने मिलकर यज्ञ किया,
फल यज्ञ का तुमको दिया,
वैंकुंठ त्याग धरा पर,
तुमने वास किया,
लक्ष्मी ने पद्मावती बनकर जनम लिया,
धरती पर जनम लिया,
बन में सखियों के संग,
विचर रही थी वे जग,
तुमसे मिलन हुआ,
तिरुपति नाथ की महिमा जो निसदिन गाये,
वरदान वो नित पाये,
धन वैभव सुख सारे,
जीवन भर पाये,
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