
जाओ माया पापणी,
सायब ने रटवा दे।
दोहा – कि माया ऐसी पापणी,
और फंद ले बैठी हाट,
ज्यौ त्यौ फंद ने फान्दिया,
तौ गया कबीरा काट।
ऐ सायब ने रटवा दे,
माने सुमिरण करवा दे,
थे जावो माया पापणी,
चौरासी मे फिरे भटकती,
मन नही लगवा दे,
ऐ माथे धरी पाप की मटकी,
बाने आगे फुटवा दे,
अरे संत नाम कि ज्योत जली,
माने दर्शन करवा दे,
ऐ अमर पटाय उनका हाथ मे,
माने नाम लिखावा दे,
निरध्य नाम का बन्या नगाडा,
माने बजावा दे,
ऐ आवा गमन से दुर हटाके,
माने मुक्ति पावा दे,
संत नाम का खोल्या द्वारा,
ए कहे कबीर सुनो भाई संतो,
माने जनम छुडावा दे,
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