
जिसके मरज बैठ जया दिल में,
ना उसके कोई दवाई लागे,
ना अपण्या की मान्या करता,
जिस्कै सिख पराई लागे।।
कौन जो मन की मेट भुख दे,
पल में गिला दूर थुकदे,
बुरे काम मैं लाख फुक दें,
पुन मैं ना एक पाई लागे,
घणे भाग हों उस मानस के,
जब आच्छी जगह कमाई लागे,
ज़िस्कै मरज बैठ जया दिल पै,
ना उसकै कोए दवाई लागे,
चकर न्यारा न्यारा चलता,
ना मानश का चारा चलता,
किसेका तो ही गुजारा चलता,
किसे के धन कै काई लागे,
को को करै मोज किसे नै,
जीवन यो दुखदाई लागे,
बन जा लायक देखन लायक नज़ारे,
बहोत इसी चकर में आ रे,
ये गैर बणसे प्यारे दुश्मन,
माँ का जाया भाई लागे,
माँ बापा ने दूर बैठा देया,
घर में सेशन लुगाई लागे,
बहोत से गए देख अगत ने,
बहोत से रोवे से किस्मत ने,
गुरु राम भगत या बात तेरे ते,
श्री जगन्नाथ समझाई लागे,
कितना भला करेजा जगत में,
आकर हाथ बुराई लागे,
गायक – नवीन पुनिया।
प्रेषक – अंकित धाकड़।
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