
ढेलडी मार्ग में क्यु ब्याई,
दोहा: अजगर करे नी चाकरी,
तो पंछी करे नि काम,
दास मलुका यु कहे,
सब के दाता राम।
थारा बचीया बिलड ले जाई रे,
मार्ग में थे ईण्डा रे बेलीया,
आ कई अकल गमाई,
रात दिन थारी करू रखवाली,
पलक देर नही आई रे ढेलडी,
मार्ग मे क्यु ब्याई ए हा।।
जेठ जी गया अजमो लेवन,
ने लावत देर लगाई,
छोको देख ने अजमो लावो,
कोड करे ने खाई रे ढेलडी,
चीठी कबुडी थारे काकी लागे,
कागला बुआ रो बेटो भाई,
मोरीया ने कटे घमायो,
एकली क्यु आई रे ढेलडी,
पानी जल रो अमर पिचको,
अरट बगेची माई,
दादा गुरु री बाडी देखने,
हरे भेटवा खाई रे ढेलडी,
दादा वाणी रा दर्शन करना,
मारे मन मे आई,
छोकालाल कहे रे संतों,
सीख देनी खाई रे ढेलडी,
प्रेषक – मनीष सीरवी
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