
दानी एक बैठा है खाटू के दरबार में,
(तर्ज – काम कोई भी कर नहीं पाया)
छप गया, छप गया, छप गया अखबार में,
दानी एक बैठा है खाटू के दरबार में,
सेठ सांवरे की माया है पूरे संसार में,
दीन-दुखी के आँसू पोछे, सुना है मैंने सबसे ये,
मेरी ओर भी नजर घुमा लो, दास खड़ा है कब से ये,
जिस-जिस की तू अर्जी सुनता, बैठा वो परिवार में,
हार के मैं भी आया बाबा, तेरे इस दरबार में॥
कोई दुखड़े सुनता तुमको, कोई हाल बताता है,
झाड़ा जब लगवाए बाबा, नाच-नाच मुस्काता है,
जिस पे होती कृपा तुम्हारी, खुशियाँ उसके द्वार में,
खाटू आकर मैंने बाबा, कितना सुकून ये पाया है,
लोग न समझे अब तक ये, सांवरिया की माया है,
लक्की तुम भी बहते रहना, श्याम नाम की धार में,
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