
दारुडिया ने अलगो बाल रे,
भूड़ी आवे वास।
श्लोक – राम राज में दूध मिलियो,
कृष्णा राज म घी,
इन कलयुग में दारु मिलियो,
वीरा सोच समझ कर पी।।
भूड़ी आवे वास रे,
तन रो कीनो नास रे,
दारुडिया ने अलगो,
दारुढ़िया ने अलगो बाल रे,
सगा समन्धी आवे,
वे बैठा बैठा भाले,
बैठा बैठा भाले,
वे सुता सुता भाले रे,
काम काज तो करे रे कोनी,
सिधो ठेका में जावे,
वेगो उठेनी ठेका में जावे,
लांबी गाला बोले रे,
पाँव भरियो पिनो पचे,
मल मूत्र में पडियो,
थोड़ो पिदोनि घणो चडियो ,
गादा कीचड़ में पडियो रे,
घर मे तो खावानी कोणी,
लेवे मिनकारी उधार,
टाबरिया तो भूखा मरे,
पचे भीख मांगणी जाये रे,
संत महात्मा केवे,
दारुणी दोष बतावे,
खबर पड़ी तो मती पियो ,
थारो जनम सफल हो जावे रे,
“श्रवण सिंह राजपुरोहित द्वारा प्रेषित”
सम्पर्क : +91 9096558244
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