
दो रोटी देने को जब भी,
कोई हाथ बढाता है,
ना जाने फिर साथ में क्यो वो,
सौ फोटो खिंचवाता है,
तर्ज – कस्मे वादे प्यार वफ़ा।
फोटो दिखाके सबको बताया,
किसकी झोली खाली है,
पेट भरा है भूखे का या,
इज्ज़त उसकी उछाली है,
मानवता का धर्म तुम्हे क्या,
बस ये ही सिखलाता है,
बेशक वो लाचार थे लेकिन,
उनका मन ना मैला था,
मदद की खातिर किसी के आगे,
हाथ ना उनका फैला था,
भीख मिली या मदद मिली ये,
निर्धन समझ ना पाता है,
वाह वाही के लोभ में प्यारे,
कैसा दौर ये आया है,
थोड़ा देकर ओ इंसान तू,
क्यों इतना इतराया है,
सबको देने वाला ‘मोहन’,
नही किसी को जताता है,
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