
बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ
बिहारी जू भवनिधि पार उतारौ,
भवनिधि पार उतारौ,
काम क्रोध मद लोभ मोह सँग,
केहि विधि करों गुजारौ,
भाँति भाँति के पाप कर्म ते,
ह्वै गओ तन-मन कारौ,
परहित कबहुँ भयो न मोपै,
स्वारथ में तन गारौ,
कुटिल, कुचाल, नीच, निन्दारत,
पातक सदा पिआरौ,
हों अनाथ अघपुंज जनम कौ,
कबहुँ न नाम उचारौ,
राधा-प्रियतम गिरधर मोरे,
अवगुन चित न धारौ,
दीनानाथ पतितपावन पन,
निज मन माहिं बिचारौ,
गणिका, गीध, अजामिल तारे,
अबकी मोहि उबारौ,
गई बहुत थोरी सी रह गई,
अब तौ नाथ निहारौ,
काके द्वार जाय समदरसी,
श्याम 'अशोक' तिहारौ,
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