
बुलाओ जो तुम प्रभु को,
प्रेम से बुलाना,
प्रेमियों के घर में रहता,
इनका आना जाना,
तर्ज – सौ साल पहले।
पासे में दुर्योधन ने जब,
पांडव को हराया था,
और भरी सभा में द्रोपती का,
जब चिर उतारा था,
प्रेम की आवाज सुनकर,
चिर को बढ़ाया,
शबरी ने बड़े ही प्रेम से जब,
उन्हें घर में बुलाया था,
खाटे ना निकले बेर स्वयं,
उन्हें चख के खिलाया था,
झूठे ना बेर वो था,
प्रेम का नजारा,
नानी बाई ने प्रेम भरे जब,
आंसू ढुलकाए,
बहना को रोते देख मेरे,
गिरधर ना रह पाए,
चुनड़ी ओढ़ाए देखो,
जग का पालनहारा,
ये प्रेम पुजारी है ये बस,
प्रेमी को ढूंढ़ता है,
जब मिल जाता है प्रेम,
मेरा नटवर ना रुकता है,
‘शुभम रूपम’ का कहना,
भूल ना जाना,
स्वर – शुभम रूपम।
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