
भजन बिन ये जीवन,
पशु जैसा बीते,
भजन जो करे नित,
वही जग में जीते,
प्रभु के चरण से,
जो रहते है लिपटे,
भजन नाम अमृत,
वो ही जग में पीते,
कहीं वाह का काम,
कुछ ना किया जो,
वो रोते ही आया,
गया रोते रोते,
सत्कर्म सेवा जो,
कुछ ना किया है,
तो जीवन गया,
पाप का गांठ ढोते,
अगर चाहते हो,
तुम दीदार उनका,
तो मन रूपी दर्पण,
रहो रोज धोते,
जब तुम जानते हो,
की फल कैसा होगा,
तो क्यों खेत में,
काँटे का बीज बोते,
गायक – धीरज कान्त।
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