
मन मस्त हुआ फिर क्या बोले।
क्या बोले फिर क्या बोले ,
मस्त हुआ फिर क्या बोले।
हीरा पाया बाँध गठरियाँ ,
बार बार बांको क्यों खोले।
हंसा नहावे मान सरोवर ,
ताल तलैया क्यों नहावे ।
हल्की थी तब चढ़ी तराजू ,
पूरी भई बांको क्यों तोले।
सूरत कलाळी भई मतवाली ,
मदवा पी गयी अण तोले।
तेरा सायब है तुझ माही ,
बाहर नैना क्यों खोले।
कहत कबीर सुनो भाई साधो ,
साहेब मिल गये तिल तोले।
1: “मन मस्त हुआ फिर क्या बोले” का क्या अर्थ है?
: इसका अर्थ है जब मन पूर्ण रूप से भगवान या सत्य में लीन हो जाता है, तब शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती। वहाँ मौन ही सबसे बड़ा अनुभव होता है।
2: यह भजन किसकी रचना है?
: यह भजन संत कबीर, संत रविदास या अन्य निर्गुण भक्ति संतों की वाणी से प्रेरित माना जाता है।
3: यह भजन किस शैली में आता है?
: यह भजन निर्गुण भक्ति और सूफी दर्शन से जुड़ा हुआ है। इसमें आत्मिक अनुभव और आंतरिक शांति पर बल दिया गया है।
4: इस भजन को कहाँ गाया जाता है?
: यह भजन आमतौर पर सत्संग, ध्यान शिविर, भजन संध्या, और संत समागमों में गाया जाता है।
5: क्या यह भजन ध्यान के लिए उपयुक्त है?
: हाँ, यह भजन मौन साधना और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत उपयुक्त है। यह गहरे ध्यान में ले जाने वाला भजन है।
6: क्या इसका कोई प्रसिद्ध गायक है?
: हाँ, यह भजन प्रह्लाद टिपानिया, चैतन्य भक्त मंडल, और अन्य निर्गुण भजन गायकों द्वारा प्रस्तुत किया गया है। यूट्यूब पर इसके कई संस्करण उपलब्ध हैं।
7: क्या इसका अर्थ और भावार्थ समझने योग्य है?
: अवश्य। यह भजन शारीरिक इंद्रियों से परे, आत्मा की अवस्था का अनुभव कराता है। इसका भावार्थ है – जब आत्मा प्रभु से मिलन कर लेती है तो दुनिया की बातों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
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