
मन रे काई करबा ने आयो देसी
मन रे काई करबा ने आयो,
वृथा जन्म लियो धरती पर,
जन्म लेर पछतायो।।
मिनख जमारो दियो रामजी,
प्रारब्ध से पायो,
थारी-म्हारी करता करता,
कदै न हरि गुण गायो,
मृग-तृष्णा में फंसग्यो भान्दू,
दौड़-दौड़ कर धायो,
कदै न प्यास मिटी न थारी,
सूखो सरवर पायो,
जप-तप दान कदै न कीनो,
ना कोई संत जिमायो,
सत की संगत में कदै न बेठ्यो,
ना कोई गंगा न्हायो,
लख-चौरासी से बचणो व्हे तो,
अब थारो अवसर आयो,
जेठू पुरी कहे समझ मन मेरा,
सतगुरू जी समझायो,
प्रेषक – भंवर गिरी बच्छखेड़ा।
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