
मन रे जीवन है दिन चार,
राम का सुमिरन कर ले बन्दे,
दुनिया में नहीं सार,
जीवन है दिन चार,
कल परदेस में आया था तू,
लौट तुझे घर जाना है,
कब समझेगा बात ये मनवा,
झूठ को क्युँ सच माना है,
ओ कल परदेस में आया था तू,
प्राण का पंछी खोल उड़ेगा,
तन पिंजरे का द्वार,
जिसके पीछे भागे वो है साया,
हाथ न आएगा,
इतराएं करनी पे लेकिन,
अंत समय पछताएगा,
ओ जिसके पीछे भागे वो है साया,
काहे सर पे लिए फिरे तू,
जनम जनम का भार,
दुनिया एक मुसाफिरखाना,
हर चेहरा लगता बेगाना,
जिसे बुलावा आ जाएगा,
छोड़ जगत उसको है जाना,
ओ दुनिया एक मुसाफिरखाना,
राम बिना नहीं कर पाएगा,
ये भवसागर पार,
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