
माता शेरावाली के,
द्वार जो भी जाता है,
खाली हाथ जाता है,
झोली भर के लाता है।।
तर्ज – तुम तो ठहरे परदेसी।
ममता झलकती है,
तेरे दिव्य मुखड़े से,
तू निहार ले जिसको,
वो ही मोक्ष पाता है,
मैया शेरावाली के,
जो भी व्यक्ति आता है,
मैया तेरे द्वारे पर,
प्रार्थना के धागे में,
दिल पिरो के लाता है,
सब के घर है उजियारा,
इसलिए की जग सारा,
तेरे द्वार की माटी,
आँखों से लगाता है,
वृंदावन हो या काशी,
सब है तेरे अभिलाषी,
सारा जग तेरी धुन में,
बांसुरी बजाता है,
तू विनाश करती है,
दानवों का असुरों का,,,क्योंकि,
श्रीधर के घर में एक दिन,
नवरात्रों में आई,
भैरव के सामने जब,
खाना सजा के लाई,
भैरव ने तेरे मुख पर,
जब अपनी दृष्टि डाली,
तु दिव्य कन्या है,
यह गुप्त बात पा ली,
जैसे ही उसने मैया,
तुझको पकड़ना चाहा,
उस निर्दई ने तेरी,
शक्ति से लड़ना चाहा,
बस एक पल में ओझल,
तू हो गई नजर से,
भैरव भी तेरे पीछे,
आया इधर उधर से,
तु दर्शनी दरवाजे से,
होकर गुजरी मैया,
और बाणगंगा तेरे,
बालों से निकली मैया,
लंगूर वीर ने भी,
पानी यही पिया था,
पीछा मगर वहां पर,
भैरव ने भी किया था,
चरणों की पादुका से,
तू गर्भ जून समाई,
उस गर्भ जून से बाहर,
नौ माह तक ना आई,
नौ माह बाद निकली,
तू पहुंची हाथी मत्था,
जिसकी चढ़ाई मुश्किल,
रस्ता है जिसका सीधा,
जैसे ही तू वहां से,
अपनी गुफा तक आई,
भैरव भी आन पहुंचा,
होने लगी लड़ाई,
भैरव से लड़ते-लड़ते,
हनुमान थक गए तो,
लंगूर वीर भैरव से,
हारने लगे तो,
धारण किया उसी पल,
चंडी का रूप तुमने,
भैरव की जान ले ली,
भैरव की आरजू ने,
धड़ कटके जब गिरा था,
दहलीज पर गुफा की,
लहरा रहा था मस्तक,
आवोश में हवा की,
होठों से उसके लेकिन,
आवाज सच की आई,
हे माँ तेरी दुहाई,
दानवों का असुरों का,
तेरा नाम सुनते ही,
दैत्य कांप जाता है,
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