
मुसीबत में साथी श्याम सरकार था
मुसीबत में साथी,
श्याम सरकार था,
आज भी है और कल भी रहेगा।।
तर्ज – सौ साल पहले।
लाचार था टुकड़ों को,
मैं दर दर फिरता मारा मारा,
जिनको अपना समझा,
सभी अपनों ने किया किनारा,
श्याम पे भरोसा मेरा,
तब भी बरकरार था,
जीवन नैया मेरी,
भवर में खाये डगमग डोले,
बड़ी दूर किनारा था,
फंसी लहरों में खाये हिचकोले,
एक ही सहारा श्याम,
नाम पतवार था,
जब बाबा कृपा करें
अमावस बन जाए पूरणमासी,
दर्शन की आस लिए,
श्याम दर खड़ा ‘कृष्ण बृजवासी’,
तेरा गुणगान मेरा,
यही कारोबार था,
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