
मैं तो बरसाने कुटिया बनाऊंगी सखी,
मैं तो बरसाने झोपड़ी बनाऊंगी सखी,
बनाऊंगी सखी, रह जाउंगी सखी।।
श्रीजी के महलों से रज लेकर आऊंगी,
पीली पोखर का वाहमें जल मैं मिलाऊंगी,
संतो को बुलवाकर मैं नीव धराऊंगी,
झोपड़ी सजेगी मेरी राधा राधा नाम से,
चन्दन मंगाऊगी मैं सखियों के गाव से,
भईया को बुलवाकर कीर्तन करवाउंगी,
भजन करुँगी सारी रैन ना मैं सोऊंगी,
दरवाजा बंद करके जोर से मैं रोऊंगी,
मेरी चीखे सुन सुनकर वो रुक नहीं पाएंगी,
आएंगी किशोरी जी तो भोग मैं बनाऊंगी,
लाडली आरोही की में चवर डूलाऊंगी,
वह शयन मैं जाएंगी मैं चरण दबाऊंगी,
ढोलकी बजाए हरिदासी बड़े जोर से,
भाव सुने रे बृजवासी बड़े गौर से,
मैं मन ही मन सबके चरणन बिछ जाऊंगी,
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