
मैं बंजारन दीवानी मैं हो गई पि गई थोड़ी भंग मैं
मैं बंजारन दीवानी मैं हो गई,
पि गई थोड़ी भंग भंग मैं,
सावन की रिम झीम,
बरखा बदरिया,
भीग गयो सब अंग अंग मेरो,
तर्ज – कब आएगा मेरे बंजारे।
डमरू तेरा मुझको नचाये,
क्या करूँ कुछ भी होश ना आये,
मस्ती में तेरी नाच रही हूँ,
सारी दुनिया हो गई दंग दंग,
भोला पि गई थोड़ी भंग भंग मैं,
जीवन नैया तेरे हवाले,
जितना चाहे उतना नचाले,
पगली दीवानी सब कहने लगे,
मोपे चढ़ गया तेरे रंग रंग,
अच्छा बुरा क्या होश नहीं है,
तेरा भी इसमें दोष नहीं है,
‘लहरी’ ना जानू बाबा कुछ भी जानू,
तोए पूजन को का ढंग ढंग,
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