
मोहन की द्वारिका में चलके सुदामा आया
मोहन की द्वारिका में,
चलके सुदामा आया,
आशाएं अपने मन में,
कितनी संजो के लाया,
मोहन की द्वारका में।।
तर्ज – मुझे इश्क़ है तुझी।
सुनलो ऐ द्वारपालो,
कान्हा से तुम ये जाके,
कह दो खड़ा सुदामा,
द्वारे पे तेरे आके,
बचपन का यार उनके,
दुःख ने बड़ा सताया,
चल के सुदामा आया,
सुनते ही दोड़े मोहन,
फिर छोड़ के सिंघासन,
देखा जो यार अपना,
सूद बुध गवाएं मोहन,
नटवर ने यार अपना,
सिने से फिर लगाया,
देखि यार की दशा जो,
कान्हा फुट करके रोये,
असुवन से फिर सुदामा,
के पग हरी ने धोये,
छुते ही पग हरी ने,
कंचन बना दी काया,
बनी झोपड़ी जहाँ थी,
वहाँ महल था बनाया,
रातो ही रात जाके,
घनश्याम ने की माया,
जन्मों जनम का दुखड़ा,
था यार का मिटाया,
स्वर – राकेश जी काला।
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