
रहो संसार में तुम पानी,
और कमल की तरह,
करके सत कर्म,
बुजुर्गों से दुआएं ले लो,
तर्ज – हम तेरे शहर में।
है पतंग दूर कहीं,
डोर उनके हाथों में,
उनका ही कर्ज है तेरी,
हर एक सांसो में,
उनकी मर्जी जब वो चाहे,
इसे वापस ले ले,
पा के जीवन में ख़ुशी,
हर्ष मनाता क्या है,
दुःख की परछाई को तू,
देख के डर जाता है,
जबकि सुख दुःख पे नहीं,
तेरा कोई जोर चले,
पा के नर तन तू,
अपने को समझता क्या है,
लोग छूने से डरेंगे,
अकड़ता क्या है,
चार दिन के लिए,
है रंग बिरंगे मेले,
चैन से सोए सभी,
वो न कभी सोता है,
उनकी मर्जी से ही,
हर काम यहाँ होता है,
अपने ही कर्मो से मानव,
यहाँ सुख दुःख झेले,
गायक – राजीव सिंह।
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