
कबीर के दोहे – अनूप जलोटा
राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट – अनूप जलोटा
हिंदू कहो तो मैं नही मुसलमान भी नही
हिंदू कहो तो मैं नही मैं नहीं मैं नही
हिंदू कहो तो मैं नही मैं नहीं मैं नहीं मुसलमान भी नही
पाँच तटवा का पुतला गेवे खैइले माही
चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोये
दो पतन के बीच मे सबूत बचा ना कोए
माली आवत देख के कालिया करे पुकार
फूली फूली चुन लाई काल हमारी बार
पाहन पूजे हरी मिले हरी मिले
पाहन पूजे हरी मिले तो मैं पूजू पहाड़
ताते तो चक्की भली पीस खाए संसार
कबीरा ताते तो चक्की भली पीस खाए संसार
साहिब ते सब होत बंदे से कछु नाही
राई ते पर्वत करे पर्वत राई माही
बुरा जो देखन मैं चला बुरा ना मिलया कोए
जो दिल खोजो अपना मुझसे से बुरा ना कोए
सतगुरु के उपदेश का सुनिओ एक विचार
जो सतगुरु मिलता नही जाते यम के द्वार
मूड मुड़ाये हरी मेले सब कोई ले मुड़ाये
बार बार के मूड ते भेड़ बैकुंठ बैकुंठ ना जाए
ये तन विष की बेलरी गुरु अमृत की ख़ान
शीश दिए तो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
सई इतना दीजिए जा मे कुटुंब समाये
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु ना भूखा जाए
कबीरा साधु ना भूखा जाए
दया धरम का मूल है पाप मूल संताप
जहा छमा वहां धर्म है जहां दया वहां आप
जो तिल माही तेल है जो चकमक मे आग
तेरा सई तुझ मे है जाग सके तो जाग
कबीरा जाग सके तो जाग
राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट
फिर पीछे पछतायेगा जब प्राण जाएंगे छूट
कबीरा जब प्राण जाएंगे छूट
सुन भाई साधु कहे कबीरा जब मैं था हरी नही
उड जा हंस अकेला – एक डाल दो पंछी बैठा
कबीर के दोहे – बड़े बड़ाई ना करे बड़े ना बोले
दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे ना कोए
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