
विदुर घर आए बाँके बिहारी
विदुर घर आए बाँके बिहारी
बाँके, बिहारी जी, बाँके बिहारी ॥
श्याम को, देख, मगन बिदुरानी ।
फूली, मन में, ना हीं समानी ॥
आँगन, में ठाढ़ी सुध, बुद्ध बिसारी ।
बिदु, रानी अति, मगन भई है ।
तन, मन की उन्हें, सुध ही नहीं है ॥
कहाँ पे, बिठाऊँ मैं, कृष्ण मुरारी ।
फ़ल, छीले और, प्रभु को ज़िमाए ।
कृष्ण, को छिलका, वो देती जाए ॥
खुश, होके खाए देखो, कृष्ण मुरारी ।
प्रबल, प्रेम की, धारा बह रही ।
फल, फेंके और, छिलका खिलाए रही ॥
आनंद, बड़ा आए ये, कहते मुरारी ।
भजे, प्रेम से, जो गिरधारी ।
साँवरिया है, प्रेम पुजारी ॥
भक्तों, के मन भाए, चक्र धारी ।
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