
मैंने सपनोे देखो रात भाएली,
भुस ढो रही बांध गठरिया में,
वृंदावन छुपो चुनरिया में....
ज्यादा लाऊं तो बोझ लगे,
थोड़ा लाऊं तो शर्म लगे,
मैं कह रही मेरे भरतार,
बोंगो आंगन में गढ़वा दीजो,
मेरा फैशन अजब बना दीजो,
मैंने सपनों देखो रात....
लहंगा पहनो तो बोझ लगे,
साड़ी पहरू तो शर्म लगे,
बजरिया आंगन में लगवा दी जो,
मेरा फैशन अजब बना दियो,
दुधवा पीने की होस लगे,
सानी करने में शर्म लगे,
डेरी आंगन में खुलवा दीजो,
लड्डू खाओ तो मिठो लागे,
टिक्की खाऊं तो मिर्च लगे,
के रबड़ी आंगन में मंगवा दीजो,
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