
सोहे हैं गंग की धार,
सर्पो का गले में हार,
तेरा अद्भुत है सिंगार,
शिव तुम कितने सुंदर हो,
तुम कितने सुंदर हो।।
तर्ज – ना कजरे की धार।
तेरा रूप है अजब निराला,
कहलाये डमरू वाला
कानों में बिच्छुवन माला,
आंखों में तेज मतवाला,
माथे पे सोहे चंदा,
तुझमें ही जगत का सार,
तन पर हो भस्म रमाये,
और बाघम्बर लिपटाये,
ओ नंदी के असवार,
नही है इस सकल जगत में,
भोले समान कोई दानी,
देवों के देव कहलाये,
जपते इसे योगी ध्यानी,
खुद पीले विष की गगरी,
दुनिया को अमृत धार,
नित भंग धतुरा खाये,
और डमरू जोर बजाए,
भोले की महिमा अपार,
संकट से सदा उबारे,
जो ध्याये निर्मल मन से,
दर्शन दे भाग्य सँवारे,
काटे क्लेश जन जन के,
जिसने भी जो वर मांगा,
पा जाता वही वरदान,
त्रिपुरारी भोले भंडारी,
करते नंदी की सवारी,
मिल बोलो नमः शिवाय,
स्वर / रचना – मुकेश कुमार जी।
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