
शिव शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे,
जीवन है ये थोड़ा आ आ,
जीवन है ये थोड़ा,
दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,
ना मेरा ना तेरा बाबू,
इस घोड़े पर प्रभु का काबू,
परमपिता ही इसे चलाता,
दिखा दिखा कर कोड़ा,
पल पल बीत रही ज़िन्दगानी,
कल की चिंता कर ले रे प्राणी,
पल पल पल पल पल पल पल पल,
ना जाने कब टूट पड़े ना जाने कब टूट पड़े,
माथे पे काल हथौड़ा,
दसों दिशाओं के दरवाज़े,
कहते रोज़ बजाकर बाजे,
बात इस नाश्वान शरीर की चल रही है,
प्राण कहाँ से निकलेंगे,
किसी को कुछ मालूम नहीं,
किसी कवि ने बहुत अच्छी बात लिखी है,
कि रंग महल के दस दरवाज़े,
ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी सईयां निकल गये,
( सईयां याने प्राण ) सईयां निकल गये मैं ना लड़ी थी,
यह शरीर ही वोह रंग महल है जिस में दस दरवाज़े है,
प्राण कहाँ से निकलेंगे किसी को कुछ मालूम नहीं है……
बता ये दुनिया वाले तूने,
कितना पुण्य है जोड़ा,
शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव,
शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे जीवन है ये थोड़ा,
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