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शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा
प्रेरक कहानी: बिना श्रद्धा और विश्वास के, गंगा स्नान
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नर्मदेश्वर शिवलिंग बने की पौराणिक कथा
नर्मदा परिक्रमा यात्रा
सबिन्दुसिन्धुसुस्खलत्तरङ्गभङ्गरञ्जितं द्विषत्सु पापजातजातकारिवारिसंयुतम् ।
कृतान्तदूतकालभूतभीतिहारिवर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥1॥ त्वदम्बुलीनदीनमीनदिव्यसम्प्रदायकं कलौ मलौघभारहारि सर्वतीर्थनायकम् ।
सुमच्छकच्छनक्रचक्रचक्रवाकशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥2॥ महागभीरनीरपूरपापधूतभूतलं ध्वनत्समस्तपातकारिदारितापदाचलम् ।
जगल्लये महाभये मृकण्डसूनुहर्म्यदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥3॥ गतं तदैव मे भवं त्वदम्बुवीक्षितं यदा मृकण्डसूनुशौनकासुरारिसेवि सर्वदा ।
पुनर्भवाब्धिजन्मजं भवाब्धिदुःखवर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥4॥ अलक्षलक्षकिन्नरामरासुरादिपूजितं सुलक्षनीरतीरधीरपक्षिलक्षकूजितम् ।
वसिष्ठसिष्टपिप्पलादिकर्दमादिशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥5॥ सनत्कुमारनाचिकेतकश्यपादिषट्पदैः धृतं स्वकीयमानसेषु नारदादिषट्पदैः ।
रवीन्दुरन्तिदेवदेवराजकर्मशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥6॥ अलक्षलक्षलक्षपापलक्षसारसायुधं ततस्तु जीवजन्तुतन्तुभुक्तिमुक्तिदायकम् ।
विरञ्चिविष्णुशङ्करस्वकीयधामवर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥7॥ अहोऽमृतं स्वनं श्रुतं महेशकेशजातटे किरातसूतवाडवेषु पण्डिते शठे नटे ।
दुरन्तपापतापहारिसर्वजन्तुशर्मदे त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥8॥ इदं तु नर्मदाष्टकं त्रिकालमेव ये सदा पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गतिं कदा ।
सुलभ्य देहदुर्लभं महेशधामगौरवं पुनर्भवा नरा न वै विलोकयन्ति रैरवम् ॥9॥
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