
श्री राधे मोहे बृज को बनइयो मोर नाचूँ ता ता थई थई
श्री राधे मोहे बृज को बनइयो मोर,
नाचूँ ता ता थई थई,
ता ता थई थई,
मैं नाचूँ ता ता थई थई,
श्यामा जू मोहे बृज को बनइयो मोर,
चाहे मुझे कुंजन को बन्दर बनइयो,
बन्दर भी निधिवन के अन्दर बनइयो,
गोकुल को बनइयो ढोर,
चाहे मुझे गलियन को कुकर बनइयो,
कुकर बनइयो भक्त द्वारन फिरइयो,
वन में घुसने ना दूँ चोर,
चाहे मुझे धूल हु बनइयो वृन्दावन की,
श्री वृन्दावन की बिहारी के चरण की,
जहाँ खेलें नित्य किशोर,
चाहे मुझे घुंगरुं या पायल बनइयो,
अपने ही रस का पागल बनइयो,
तेरे बंधू प्रेम की डोर,
स्वर – श्री चित्र विचित्र महाराज जी।
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