
श्री राम भक्त बजरंगी,
तेरे खेल है अजब निराले,
प्रभु की सेवा में तुमने,
कितने ही काज सँवारे,
तर्ज – मानो तो मैं गंगा माँ हूँ।
सागर तट पर बैठे वो नर,
भालू सब घबराकर,
मार छलांग गए लंका में,
लंका आप जलाकर,
सिता का संदेसा लाकर,
रघुवर को सुनाने वाले,
हुआ ना होगा इनके जैसा,
राम भक्त कोई दूजा,
उनके ही रक्षक बन जाते,
जो करे राम की पूजा,
इस ‘अमर’ के दुःख भी हरलो,
सबके दुःख हरने वाले,
लक्ष्मण को मुर्छित देखा,
तब राम बहुत घबराए,
सूरज उगने से पहले,
संजीवनी बूटी लाए,
तुम ही तो हो लक्ष्मण को,
नव जीवन देने वाले,
अहिरावण राम लखन को,
छल से ले गया उठाकर,
तुम राम लखन को लाए,
अहिरावण मारा जाकर,
हो अजर अमर बजरंगी,
तुम संकट हरने वाले,
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