
साँचा तेरा दरबार सांवरे,
महसूस ये हमने किया है साँवरे,
तर्ज – पलकों का घर।
तेरह पेड़ी चढ़ कर तेरे,
दर्शन जब होते है,
रोम रोम मेरा हर्ष उठे,
जब तुमसे नैन लडे है,
भूलूँ सारी मैं चिंता,
ये जग की साँवरे,
जो भी तेरे दर पे आता,
वो तेरा हो जाता,
बिन माँगे सब कुछ तू देता,
लखदातार कुहाता,
मैंने बनते ही देखे हैं,
बिगड़े काम रे,
बेफीकर हूँ अब मैं बाबा,
तुम जो साथ हो मेरे,
हँसते हँसते मै चलता हूँ,
तुम जो माँझी मेरे,
मोहित जग की नहीं है,
दरकार साँवरे,
औक़ात नहीं थी कुछ भी मेरी,
तुमने गले लगाया,
बाथीं भर कर मुझको बाबा,
मेरा साथ निभाया,
अब तो जीवन मेरा,
ख़ुशहाल साँवरे,
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