
हमने ब्रज के ग्वाले से अपना दिल लगाया है
हमने ब्रज के ग्वाले से,
अपना दिल लगाया है,
नींद भी गवाई है,
चैन भी गवाया है,
दिल मेरा बेकाबू,
हो जाता है उस पर,
देखता है मेरी तरफ,
और मुस्कुराता है,
कई बार चाहा उसे,
हाले दिल सुनाऊ मैं,
होंठ मेरे खुल ना सके,
सामने जो आया है,
सब ये समझते है,
वो बांसुरी बजाता है,
पर उसने इशारों से,
हमको बुलाया है,
स्वर – श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज।
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