
हरि नाम बिना नर बावलिया,
नरका में जावे रे।
दोहा – जितना हेत हराम से,
उतना हरि से होय,
चला जाए बैकुंठ में,
तो तेरा पल्ला न पकडे कोय।
नरका में जावे रे मूरख,
तर्ज – नाम तेरो भूल गयो भगवान।
कर कर खोटा करम तू बंदा,
गंगा न्हावे रे,
मन को खोट काढयो नहीं तो,
जमड़ा ढावे रे,
सुंदर काया तीन दिना री,
क्यूँ गरभावे रे,
बचपन जाए जवानी जावे,
अंत मुखडो बावे रे,
द्वेष वासना तजकर जे नर,
नटवर चावे रे,
आवागम का सांसा मिट,
अमरापुर जावे रे,
सांचो हेत हरि से कर,
क्यूँ गोता खावे रे,
कहत कबीर नर भवसागर में,
मुड़ नहीं आवे रे,
गायक – कबीर राजस्थानी।
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