
हरि ने पुछ लिया बैकुंठ जाना है,
मैंने भी पूछ लिया क्या वहां बरसाना है
हरि ने पुछ लिया वैकुंठ जाना है...
कहां हैं स्वर्ग में ऊंची अटारी के दर्शंन,
ना है रंगीली गली और ना है गहवर वन
मेरा तो ख्वाब राधा रानी को रिझांना है,
इस लिए पूछ लिया क्या वहां बरसाना है
कहां देखूंगा मैं गोविंद को रिझाते हुए,
रूठी राधा के चरणों में गिड़ गिड़ाते हुए
मान मंदिर का यहां हर कोई दीवाना है,
कहां आनंद होगा लट्ठमार होली का,
ना ही रसपान होगा मधुर बृज़ की बोली का
मुझे उन चौंक चौबारों का दर्श पाना है,
अब तो राजीव की केवल यहीं तमन्ना है,
मेरा तो नेम है मुझको वहीं पे मरना है
(छंद)
मरने को मेरा नेम है,मैं मरुं श्री राधे द्वार
कभी तो लाडली पुछेंगी ये कौंन पड़ो दरबार
प्रारब्ध से मुझको जनम मिला,
मेरी इच्छा रह गई मन ही मन में
इतनी आस पुजादो किशोरी, मेरी सांस गुज़रे बृज़ में
आख़री हिचकी मेरी प्यारी,तेरे गीतों में निकले
क्योंकि मोत भी मैं,शायरानां चाहता हूं
छोड़ बरसाना बैकुंठ नहीं जाना है,
मुझे तो राधा राधा राधा राधा गाना है
रचनां एवंम गायंन-राजीव शास्त्री जी
(सोनीपत)
बाबा धसका पागल पानीपत
संपर्कंसुत्र-7206526000
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