
हरी तेरा अजब निराला काम,
दोहा – आरी री भवानी वास कर,
तो मेरे घट के पट दे खोल,
रसना पे बासा करो,
तो मैया सूद सब्द मुख बोल।
कण कड़ी मण कुंजरा,
और अनड पंक गज चार,
इज घर पड़ी उजाड़ में,
तो दाता देवण हार।।
अजब निरालो काम साँवरिया तेरो,
अजब निरालो काम।।
माया की धन बाँध पोटड़ी,
करता गर्भ गुमान,
या माया अंत काम न आवे,
अरे नही जाणे रे अज्ञान,
हरी थारो अजब निरालो काम,
मालिक थारो अजब निरालो काम,
सुख में सुमरण कोई नही करता,
दुःख में रटे तमाम,
मालिक मेरा सब कुछ तेरा,
क्यूँ भुला इंसान,
तेरा तुझसे पाकर के नर,
बन बैठा धनवान,
नर तन चोला पाकर भोला,
रटयो नही भगवान,
क्या करता क्या करदे रे मालिक,
नही समझयो तु अज्ञान,
एक दिन माटी में मिल जावे,
हाड मांस और चाम,
झूठी काया झूठी माया,
साँचो तेरो नाम,
तू ही वाहे गुरु तू ही अल्लाह,
तू ही ईश्वर राम,
कहे कबीर बुला ले मैं तेरे,
चरणा में करू विश्राम,
प्रेषक – रामस्वरूप लववंशी
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