
माँ गंगे माँ गंगे माँ गंगे माँ ,
हे पतीत पावनी गंगा कैसे में तुझे बुलाऊ,
नैनों में ज्योति नही है कैसे तेरा दर्शन पाऊ,
मैने सुना हे गंगा मईया अमृत सा तेरा जल है ,
तेरी स्वर्ग से उतरी धारा निर्मल उज्जवल शीतल है ,
ऐ माँ ममता के आंचल में, मैं भी तो सो जाऊ ,
अंधा हुँ गिर गिर के में राहो में संभलता आया ,
बेदर्द जमाना मुझको पग पग पर ढेस लगाए ,
तेरे बिना ना कोई जग्ग में ये दर्द में किसे सुनाऊ,
सब अपने हुए पराये गेरों का क्या हे सहारा,
मेरी बूढ़ी माँ मेरे घर में, मैं उसकी आँख का तारा,
करदे मईया तु मै धन्ये धन्ये हो जाओ ,
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