
है ऊबी मारा साहिबा रे सरवरिया वाली पाळ
है ऊबी मारा साहिबा रे,
सरवरिया वाली पाळ।
दोहा – सायब तेरी सायबी,
सब घट रही समाय,
मेहंदी तेरे पान में तो,
लाली रही छुपाए,
साहब तुझ में यूं बसे,
जो तैली में तिल,
ज्ञान की घाणी फिरायले,
फिर देख ले इसका खेल।
ओ मारा आलम राजा रे ए हां,
सत वचननो री बंधी रे,
हरी थारी वाट जोवु हां,
मुंह तेल सडोली रे,
सांवरिया री वाट जोवु हां।।
हे जी दनडा वेगीयाता दो ने चार,
हे जुग रे सोतोड़ो बाई रे व्रतियो ओ हां,
घस गई मारी आंगलीया री रेख,
हे दनडा गणता रा पांचे पेरुआ हां,
घरे परा पधारो रे मारा आलम राजा रे ए हां,
करु परो मुंह मालन वालों वेश,
मुंह मालन वेइ ने रे हर थारे फुलडा लावु हां,
मालणकी वेई ने रे सांवरिया रे हेवरो लावु हां,
करु परो मुंह गुर्जर वालों वेश,
मुंह गुर्जर वेई ने रे हर थारे दुध लावु हां,
वउ परी घोडलीये असवार,
असवार वे ने रे काल ने मारी लेवो हां,
करु परो मुंह जोगण वालों वेश,
मुंह जोगण वेइ ने रे सारो जग ढुंढे लेवु हां,
जोगणकी वेइ ने रे हर थाने ढुंढे लेवु हां,
लिख दु कागदीया दो ने चार,
भणीयोडा वो तो रे कागद वोस लेणा हां,
पढियोडा वो तो रे कागद वोस लेणा हां,
बोलिया रूपादे रावल ने घरनार,
कोई सुख-दुख मेलो रेगुरुरा देवरो ओ हां,
भव भवरो मेलो रे गुरु रा देवरो ओ हां,
उबी म्हारा साहिबा रे,
प्रेषक – सुरेश सुथार।
(गांगुद्रा-गुजरात)
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