
राम-राम जी! 🙏 जीवन की चकाचौंध में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि यह संसार और हमारा यह शरीर नश्वर है। निर्गुण भजन
), जिन्हें हम चेतावनी भजन भी कहते हैं, हमें इसी कड़वे सच का आईना दिखाते हैं। ये भजन हमें याद दिलाते हैं कि ‘जगत में कोई ना परमानेंट’ है और यह ‘जिंदगी एक किराये का घर है’।
चाहे कबीर दास जी की वाणी हो या संतों के प्रवचन, निर्गुण भजन हमें मोह-माया त्याग कर ईश्वर से जुड़ने की प्रेरणा देते हैं। इस पोस्ट में हम आपके लिए लाए हैं उन चुनिंदा भजनों का संग्रह, जो बताते हैं कि दुनिया के रिश्ते ‘मतलब के यार’ हैं और अंत समय में केवल हरि का नाम ही साथ जाता है।
तो आइये, इन भजनों के माध्यम से मन की आँखों को खोलें और जीवन के असली उद्देश्य को समझें।
जगत में कोई ना परमानेंट,
तेल, चमेली, चंदन, साबुन,
चाहे लगा लो सेंट,
आवागमन लगा दुनिया में,
जगत है रेस्टोरेंट,
रे प्यारे, जगत है रेस्टोरेंट।
अंत समय में उड़ जाएंगे,
तेरे तंबू-टेंट,
राष्ट्रपति हो, कर्नल-जनरल,
या हो लेफ्टिनेंट,
रे प्यारे, या हो लेफ्टिनेंट।
काल सभी को खा जाएगा,
लेडीज हो या जेंट्स,
हरिद्वार चाहे काशी-मथुरा,
घूमो दिल्ली कैंट,
रे प्यारे, घूमो दिल्ली कैंट।
मन में नाम प्रभु का रखो,
धोती पहनो या पैंट,
साधु-संत की संगत कर लो,
ये सच्ची गवर्नमेंट,
रे प्यारे, ये सच्ची गवर्नमेंट।
‘लाल सिंह’ कहे इस दफ्तर से,
मत होना एब्सेंट,
जगत में सब मतलब के यार,
जिसके पास रहे धन दौलत उसके मित्र हजार,
कोई किसी का नहीं जगत में,
यह वेदों का सार जगत में,
अंत समय में साथ ना देंगे कोठी बंगला कार,
चार दिनों के खातिर हमको,
जीवन मिला उधार जगत में,
लूटपाट कर जोड़ रहे सब माया अपरंपार,
माता पिता बहन और भाई,
करते दुर्व्यवहार जगत में,
स्वार्थ सिद्धि में लगा हुआ है यह सारा संसार,
पाप पुण्य में नहीं कोई भी,
होता साझीदार जगत में,
अंत समय में रूठ ना जाए अपना पालनहार,
मान मेरा कहना नहीं तो पछताएगा,
मिट्टी का खिलौना,
मिट्टी में मिल जाएगा।
माता-पिता तेरा, कुटुंब-कबीला,
विपदा पड़े पर कोई ना किसी का,
एक दिन इंसान अकेला उड़ जाएगा,
बेटा-बेटा क्या करता है,
बेटा तेरा एक दिन,
पड़ोसी बन जाएगा,
विदा ले जाएगी,
पड़ोसी-पड़ोसी क्या करता है,
पड़ोसी तो एक दिन,
जला कर चला जाएगा,
धन-दौलत, कोठी और बंगले,
इनसे ममता छोड़ दे पगले,
सब कुछ यहीं का यहीं रह जाएगा,
मनुष्य जन्म तूने पाया रे बंदे,
कर्म ना कर तू जग में गंदे,
जैसा बीज बोएगा, वैसा फल पाएगा,
क्यों करता है मेरा-मेरा,
इस जग में बंदे कुछ नहीं तेरा,
खाली हाथ आया है, खाली हाथ जाएगा,
ये तो सब झूठा सपना है, कुछ तेरा न मेरा,
मूर्ख बन्दे, क्या है रे जग में तेरा।
कितनी भी माया जोड़ ले, फकतने भी महल बना ले,
पर तेरे मरने के बाद में, सुन, तेरे ये घरवाले,
दो गज़ कफ़न उढ़ा के तुझको छीन लेंगे तेरा डेरा,
कोठी, बंगला, कारें देख क्यों तू इतना इतराता है,
पत्नी और बच्चों के बीच तू फ़ुला नहीं समाता है,
ये तो चार दिनों की चाँदनी है, अरे फिर आएगा अँधेरा,
मूर्ख, अपनी मुक्ति का तू जल्दी कर उपाय,
अरे किसी दिन, किसी घड़ी जाने तेरी बाँह पकड़ ले जाए,
तेरे साथ ही घूम रहा है बनकर काल लुटेरा,
पाप कमाए तूने बहुत, अब थोड़ा धर्म कमा ले,
कुछ तो समय अब मानव, तू राम नाम गा ले,
राम नाम से मिट जाएगा जन्म-मरण का फेरा,
चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोये
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोए
दो दिन का जग में मेला सब
दो दिन का जग में मेला
राग: बंजारा ताल
सब चला चली का खेला।।
कोई चला गया कोई जावे,
कोई गठड़ी बांध सिधावेजी ,
कोई खड़ा तैयार अकेला,
कर पाप कपट छल माया,
धन लाख करोड़ कमायाजी,
संग चले न एक अधेला,
सुत नार मात पितु भाई
कोई अंत सहायक नाहीजी
क्यो भरे पाप का ठेला,
यह नश्वर सब संसारा,
कर भजन ईश का प्याराजी,
ब्रह्मानंद कहे सुन चेला,
हुई मतलबी है आज दुनिया,
किसी का कोई सगा नहीं है,
हुए है अपनों से लोग आहत,
है किसका दिल जो फटा नहीं है,
नहीं किसी का है अब भरोसा,
की करदे कोई कहाँ पे धोखा,
नए ज़माने की है हकीकत,
किसी के मन में दया नहीं है,
पिता का दुश्मन बना है बेटा,
की भाई भाई का शीश काटे,
करा दे पत्नी पति की हत्या,
ये काम कोई नया नहीं है,
यहाँ है झूठों का बोलबाला,
है सच के मुंह पे तो सिर्फ ताला,
तू क्यों गरीबों का जिस्म नोचे,
अमीर तुझमें हया नहीं है,
है प्यार भाई बहन का गायब,
‘सत्येंद्र’ नफरत यहाँ दिलों में,
अनुज मोहब्बत का नाम धोखा,
है कौन विष से भरा नहीं है,
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान,
कितना बदल गया इंसान..कितना बदल गया इंसान,
सूरज ना बदला,चाँद ना बदला,ना बदला रे आसमान,
आया समय बड़ा बेढंगा,आज आदमी बना लफंगा,
कहीं पे झगड़ा,कहीं पे दंगा,नाच रहा नर होकर नंगा,
छल और कपट के हांथों अपना बेच रहा ईमान,
राम के भक्त,रहीम के बन्दे,रचते आज फरेब के फंदे,
कितने ये मक्कार ये अंधे,देख लिए इनके भी धंधे,
इन्हीं की काली करतूतों से हुआ ये मुल्क मशान,
जो हम आपस में ना झगड़ते,बने हुए क्यूँ खेल बिगड़ते,
काहे लाखो घर ये उजड़ते,क्यूँ ये बच्चे माँ से बिछड़ते,
फूट-फूट कर क्यों रोते प्यारे बापू के प्राण,
मनुष जनम अनमोल रे,
मिट्टी मे ना रोल रे,
अब जो मिला है फ़िर ना मिलेगा,
कभी नही कभी नही रे,
ॐ साई नमो नमः,
श्री साई नमो नमः।
तु सत्संग मे आया कर,
गीत प्रभु के गाया कर,
साँझ सवेरे बेठ के बन्दे,
नही लगता कुछ मोल रे,
तु है बूद बूद पानी का,
मत कर जोर जवानी का,
समझ समझ के क़दम रखो,
पता नही ज़िन्दगानी का,
सबसे मीठा बोल रे,
मतलब का संसार है,
इसका क्या ऐतबार है,
सम्भल सम्भल के क़दम रखो,
फूल नही अंगार है,
मन की आँखे खोल रे,
मैंने मानुष जनम तुझको हीरा दिया,
जो तू वृथा गवाए तो मैं क्या करूँ।
मूल वेदो का सब कुछ बता ही दिया,
अब समझ में ना आये तो मैं क्या करूँ,
अन्न दूध आदि खाने को सब कुछ दिया,
मेवा मिस्ठान भी मैंने पैदा किया,
फिर भी निर्दयी हो जीवो को सताने लगा,
मॉस मदिरा ही खाये तो मैं क्या करूँ,
दीन दुखियो के दिल के दुखाने लगा,
रात दिन पाप में मन लगाने लगा,
तूने जैसा किया वैसा पाने लगा,
अब तू आंसू बहाये तो मैं क्या करूँ,
नाम हरी का तेरा पाप भी काट दे,
जो तू पाप करने से मन डाँट दे,
मैं चाहता हूँ आजा तू हरी की शरण,
अब तू ही न आये तो मैं क्या करूँ,
छोड़ कर चल कपट आजा हरी की शरण,
कट जाये सहज तेरा आवागमन,
जो कोई ना मानेगा हरी के वचन,
यही चक्कर लगाए तो मैं क्या करूँ,
चली जा रही है उमर धीरे धीरे,
चली जा रही है भैया उमर धीरे धीरे।
पल-पल यूँ आठों पहर,
धीरे धीरे, पहर धीरे धीरे।
जो करते रहोगे भैया भजन धीरे धीरे,
जो करते रहोगे बाबा भजन धीरे धीरे,
तो मिल जाएगा वो साजन धीरे धीरे,
बचपन भी जाए, जवानी भी जाए,
बचपन भी जाए, जवानी भी जाए, जवानी भी जाए,
बुढ़ापे का होगा असर धीरे धीरे।
तेरे हाथ-पाँव में बल न रहेगा,
तेरे हाथ-पाँव में बल न रहेगा, बल न रहेगा,
झुकेगी तुम्हारी कमर धीरे धीरे।
शिथिल अंग होंगे इक दिन तुम्हारे,
शिथिल अंग होंगे इक दिन तुम्हारे, इक दिन तुम्हारे,
फिर मंद होगी नज़र धीरे धीरे,
बुराई से मन को अपने हटा ले,
बुराई से मन को अपने हटा ले, अपने हटा ले,
सुधर जाएगा तेरा जीवन धीरे धीरे,
पल-पल यूँ आठों पहर, धीरे धीरे, पहर धीरे धीरे।
जिंदगी एक किराये का घर है,
एक न एक दिन बदलना पड़ेगा
मौत जब तुझको आवाज देगी,
घर से बाहर निलना पड़ेगा ॥
मौत का बजा जिस दिन डंका
फूँक दी तब पल में सोने की लंका
कर गयी मौत रावण का बांका
वैसे तुझको भी जलना पड़ेगा
रात के बाद होगा सवेरा
देखना हो अगर दिन सुनहरा
पाँव फूलों पे रखने से पहले
तुझको काँटों पे चलना पड़ेगा
ये जवानी है दो दिन का सपना,
ढूँढ ले तू जल्द राम अपना
ये जवानी अगर ढाल गयी तो,
उमर भर हाथ मलना पड़ेगा
ये तसवुर ये जोशो-जवानी
चाँद लम्हों ही कहानी
ये दिया शाम तक देख लेना
चड़ते सूरज को ढालना पड़ेगा
कितना माशूर हो जाएगा तू,
इतना मजबूर हो जाएगा तू,
ये जो मखमल का चोला है तेरा ,
ये कफन मेँ बदलना पड़ेगा ॥
कर ले इमान से दिल की सफाई,
छोड़ दे छोड़ दे तू बुराई,
वक्त बाकी है अब भी संभल जा,
वरना दो ज़क मेँ जलना पड़ेगा ॥
ऐसी हो जाएगी तेरी हालत,
काम आएगी दौलत न ताकत,
छोड़कर अपनी उँची हवेली,
तुझको बाहर निकलना पड़ेगा॥
जलवा इ हुसन भी है
और खतरा भी है ज्यदा,
जिंदगानी के ये रास्ता है
हर कदम पर सम्बलना पड़ेगा ॥
बाप बेटे ये भाई भतीजे
तेरे साथी है जीते जी के,
अपने आँगन से उठना पड़ेगा,
अपनी चौखट से टलना पड़ेगा॥
साँसों का क्या भरोसा, रुक जाए चलते चलते,
जीवन की है जो ज्योति, बुझ जाए चलते चलते,
जीवन है चार दिन का, दो दिन की जिंदगानी,
जब आएगा बुढ़ापा, थक जाए चलते चलते,
समझाना तो इशारा, ना समझा खेल इसका,
क्यों तेरी बात बिगड़ी, हर बार बनते बनते,
तेरे साथ जाये बंदे, तेरे कर्मो की कमाई,
गए जग से बादशाह भी, यु ही हाथ मलते मलते,
अब तक किया ना पगले, अब तो हरी सिमरले,
कह रही है जिंदगी की, ये शाम ढलते ढलते,
जीवन की है जो ज्योति, बुझ जाए जलते जलते,
नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का,
सदा ना रहा है, सदा ना रहेगा, ज़माना किसी का,
आएगा बुलावा तो जाना पड़ेगा,
सर तुझको आखिर झुकाना पड़ेगा,
वहाँ ना चलेगा बहाना किसी का ।
शौहरत तुम्हारी बह जायेगी ये,
दौलत यहीं पर रह जायेगी ये,
नहीं साथ जाता खजाना किसी का ।
पहले तो तुम अपने आप को सम्भालो,
कभी नहीं बुराई औरों में निकालो,
बुरा है बुरा जग में बताना किसी का,
दुनिया का गुलशन सदा ही रहेगा,
ये तो जहां में लगा ही रहेगा,
आना किसी का जग में, जाना किसी का,
झूठा है संसार रेन का सपना है
किसे करें तू प्यार कोई ना अपना है
जीवन के सफर में राही
जरा रखना कदम संभल के
तू बहक न जाना पगले
मंजिल के पास निकल के
पार तुझे टपना है
यह हुस्न नहीं मस्त जवानी जीवन की लहर तरंगे
यह बाग बगीचे बंगले खिल रहे हैं रंग-बिरंगे
एक नहीं बचना है
ओ माया के मतवाले पल-पल में उम्र ढली जा
इस काल बलि के चक्कर में चाकी में मूंग दली जा
खाक का सपना है
आया था ब्याज कमाने ना बाकी मूल रहा है
हो रामचंद्र मन मुरख तू बिल्कुल भूल रहा है
हरि को रटना है
भक्तों, ये निर्गुण और चेतावनी भजन
) हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए हैं। जीवन की भागदौड़ में हम अक्सर भूल जाते हैं कि यह शरीर और संसार नश्वर है। जब भी मन अशांत हो या दुनियादारी से थक जाएं, तो इन भजनों को गुनगुनाएं ये आपको तुरंत मानसिक शांति और वैराग्य का अनुभव कराएंगे। प्रभु का नाम ही एकमात्र सत्य है, बाकी सब ‘सपना’ है।
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