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तर्ज- सूरज कब दूर गगन से ...
है अजित नाथ प्रभु प्यारे , हम भक्तो के सहारे धरती अम्बर में गूंजे , प्रभु जयकारे ये तुम्हारे बांसी में , धाम बडा प्यारा है बाबा का द्वारा है प्राचीन प्रतिमा अजितनाथ की स्वर्णिम है इतिहास बाड़ी काली से निकले प्रभु , छाया हर्षो था उल्लास है वर्ष आठ सौ पुरानी , इस प्रतिमा की कहानी बांसी में हुई प्रतिस्ठा ,ये दुनिया जिनक दीवानी बांसी में , धाम बडा प्यारा है ये बाबा का द्वारा है प्रभु के प्रक्षालन जल से , जहाँ होती शांति धारा अमृतमय है जल धारा का , रोगो को जिसने निवारा, ये पावन शांतिधारा , मनभावन शांति धारा शांति फैलाये जग में , अभिमंत्रित है ये धारा बांसी में धाम बडा प्यारा है, ये बाबा का द्वारा है वेदी प्रतिस्ठा में भक्त जब , कीड़े देख घबराये जाप किया प्रभु अजित नाथ का , कीड़े नजर न आये अदभुत है इनकी महिमा , ये अक्षत का है कहना प्रभुवर के दर्शन करने , एकबार तो बासी आना बांसी में , धाम बडा प्यारा है ये बाबा का द्वारा है
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