
कोरस:
सुस्वागतम, सुस्वागतम, सुस्वागतम, सुस्वागतम।
लता मंगेशकर:
घर मंदिर से नहीं वो कम,
तुम रख दो जहाँ भी कदम।
सारी दुनिया बिछाएगी,
दिल अपना बिछाएंगे हम।
तुमने विश्वास ऐसा जगाया,
हमको अपनी नज़र में उठाया।
तुमने जीने का मतलब सिखाया,
जीने लगे फिर से हम।
तुम आदर्शों के रखवाले,
किए तुमने दिलों में उजाले।
दाग तुमने दिलों से निकाले,
हुए पावन तुम्हें पाके हम।
यह गीत केवल औपचारिक स्वागत
) नहीं है, बल्कि यह गहरा सम्मान, भक्ति और आत्म-समर्पण
) का भाव प्रकट करता है।
लता जी की दिव्य आवाज़ ने इन शब्दों को अमर बना दिया है।
आइए, इसके हर हिस्से के गहरे अर्थ को समझते हैं:
मुखड़ा और कोरस
गीत की शुरुआत ‘सुस्वागतम’ के बार-बार उच्चारण से होती है।
‘सु’ का अर्थ है सुंदर, शुभ या मंगलमय।
इसका अर्थ है कि हम आपका बहुत ही शुभ और मंगलमय स्वागत करते हैं।
यह एक सामूहिक वंदना है।
पहला अंतरा (चरणों की महिमा)
भावार्थ: यहाँ अतिथि को देवता के समान माना गया है।
कवि कहता है कि हे आदरणीय!
आप जहाँ भी अपने चरण (कदम) रख देते हैं, वह साधारण घर किसी पवित्र मंदिर से कम नहीं रह जाता।
आपके आने से हमारा घर तीर्थ बन गया है।
भावार्थ: दुनिया शायद आपके सम्मान में फूल या रेड कार्पेट
) बिछाए, लेकिन हम (मेजबान) इतने भावुक हैं कि हम आपके स्वागत में अपना ‘दिल’ बिछा रहे हैं।
यह सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक है।
दूसरा अंतरा (आत्म-उत्थान और नई ज़िदगी)
भावार्थ: यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि अतिथि कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक या गुरु हैं।
उन्होंने हमारे भीतर ऐसा आत्मविश्वास
) जगाया है कि हम खुद की नज़रों में उठ गए हैं (यानी, हमें आत्म-सम्मान मिला है)।
भावार्थ: निराशा के पलों में आपने हमें जीवन का सही उद्देश्य
) सिखाया।
आपके ज्ञान और सानिध्य से ऐसा लगता है जैसे हमें नया जीवन मिला हो और हम ‘फिर से’ जीने लगे हैं।
तीसरा अंतरा (पावनता और शुद्धि)
भावार्थ: आप उच्च सिद्धांतों और आदर्शों
) की रक्षा करने वाले हैं।
आपके विचारों और उपस्थिति ने हमारे अज्ञानता से भरे दिलों में ज्ञान का उजाला
) कर दिया है।
भावार्थ: हमारे दिलों में जो भी बुराइयाँ, विकार या नकारात्मकता
) थी, आपने उसे दूर कर दिया है।
आपको पाकर (पाके) हम पूरी तरह से पवित्र
) हो गए हैं।
यह गीत भारतीय संस्कृति के “अतिथि देवो भव
) के सिद्धांत का सबसे सुंदर उदाहरण है।
यह दर्शाता है कि जब कोई महान आत्मा हमारे जीवन में आती है, तो न केवल हमारा घर, बल्कि हमारा मन और आत्मा भी पवित्र हो जाती है।
यह गीत सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम का एक शाश्वत राग है।
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