
इतना तो करना स्वामी,
जब प्राण तन से निकले ।
गोविद नाम लेकर,
फिर प्राण तन से निकले ।
श्री गंगाजी का तट जो,
यमुना का बंसी – बट हो ।
मेरा साँवरा निकट हो,
इतना तो…
श्री वृन्दावन का स्थल हो,
मेरे मुख में तुलसी – दल हो ।
विष्णु – चरण का जल हो,
सन्मुख साँवरा खड़ा हो,
मुरली का स्वर भरा हो ।
तिरछा चरण धरा हो,
सिर सोहना मुकुट हो,
मुखड़े पै काली लट हो ।
यही ध्यान मेरे घट हो,
केसर तिलक हो आला,
मुख चन्द्र सा उजाला ।
डालूं गले में माला,
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