
जब तें रामु ब्याहि घर आए ।
नित नव मंगल मोद बधाए ।।
भुवन चारिदस भूधर भारी ।
सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी ।।1।।
रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई ।
उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई ।।
मनिगन पुर नर नारि सुजाती ।
सुचि अमोल सुंदर सब भाँती ।।2।।
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती ।
जनु एतनिअ बिरंचि करतूती ।।
सब बिधि सब पुर लोग सुखारी ।
रामचंद मुख चंदु निहारी ।।3।।
मुदित मातु सब सखीं सहेली ।
फलित बिलोकि मनोरथ बेली ।।
राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ ।
प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ ।।4।।
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