
(*मरियादा पुरुषोत्तम राम
हो रामा…
तेरी सदा जय हो भगवान
तू है विष्णु की छाया
तूने जग है बनाया
तेरे नाम पे लंका जले
आ धर्म के ऊपर तूने
धरम है जीता
लंकेश भी तुझसे डरे
मैं ना जानू कहाँ पे है ठिकाना मेरा
मैं तो हो गया ओ राम जी दीवाना तेरा
ओ मैं ना जानू कहाँ पे है ठिकाना मेरा
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
आरति कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।
जाके बल से गिरिवर कांपै।
रोग – दोष जाके निकट न झांपै।।
दे बीरा रघुनाथ पठाये।
लंका जारि सिया सुधि लाये।।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई।
जात पवनसुत बार न लाई।।
लंक जारि असुर संहारे।
सिया रामजी के काज संवारे।।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।
आनि सजीवन प्रान उबारे
जय सिया राम तेरी जय जयकार
मुझे दास तू बना ले बस इतनी गुहार
मेरी साँसों में बसा तू मेरी आँखों में है
देख सकता कोई भी भक्ति जो दिल में बसी है
ऐसा कोई लम्हा न कोई पल जिसमें
ओ राम तेरा कोई गुणगान नहीं है
सब कुछ भुला के सारी बंदिशें हटाके
मैंने जीवन रेखा तेरे नाम कर दी है
जय जय राम कर दी है
ओ रामा मेरे रामा मैं तो तुझको याद करूँ
ये रामायण लेके अर्चन तुझको याद करूँ
मस्ती में खो जाऊं मैं तो लीन हो जाऊं
ओ सिया पति मैं तेरा भगत हूँ तुझमें खो जाऊं
मगंल भवन अमंगल हारी
अवध में राम आये हैं
राम कथा सब विधि सुखदाई
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड पाठ
श्री राम चंद्र कृपालु
जय जय राम
भए प्रगट कृपाला
दुनिया चले ना
कभी राम बनके कभी श्याम बनके
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