
मोहे लागी लगन मनमोहन से Mohe Laagi Lagan Man Mohan Se
मोहे लागी लगन मनमोहन से
छोड़ घर द्वार ब्रज धाम आए बैठी
मोरे नैनो से निंदिया चुराई जिसने
मैं तो नैना उसी से लगाए बैठी
कारो कन्हैया सो काजल लगाई के
गालों पे गोविंद गोविंद लिखाई के
गोकुल की गलियों में गोपाल ढूँढू
मैं बावरी अपनी सुध बुध गवाई के
मिल जाए रास बिहारी मैं जाऊं वारी वारी
कह दूं नटखट से बात जिया की सारी
बात समझे गो मेरी बिहारी कभी
ये शर्त में खुदी से लगाए बैठी
ऐसी लागी लगन मनमोहन से
छोड़ घर बार ब्रज धाम आए बैठी
जो हो सो हो अब ना जाऊं पलट के
बैठी हूं कान्हा की राहों में डट के
जब तक ना मुखड़ा दिखाए सलोना
काटूंगी चक्कर यूं ही बंसी बट के
उस मोर मुकुट वाले से गोविंदा से ग्वाले से
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